स्टार न्यूज़ एजेंसी
लखनऊ (उत्तर प्रदेश). हम सभी को जन्म लेने वाले हर नवजात शिशु का स्वागत करना चाहिए. इन शिशुओं को एक हजार दिनों तक उचित देखभाल करने के साथ-साथ उसे इस अवधि में उसके पूरे अधिकार मिलने चाहिए. उत्तर प्रदेश के राज्यपाल बीएल जोशी ने आज यहां राज्यभवन में बाल अधिकार सम्मेलन की 20वीं वर्षागांठ के मौक़े पर विश्वभर के बच्चों के अधिकारों पर एक रिपोर्ट जारी करते हुए कहा कि नवजात शिशु के जीवन के पहले एक हजार दिन महत्वपूर्ण और गम्भीर होते है. उनका एक माह का समय बहुत नाजुक होता है. इस दौरान वह पूरी तरह अपनी मां पर ही आश्रित रहता है. भारत में हर वर्ष 26.1 मिलियन शिशु जन्म लेते हैं, जिनमें से 9.38 लाख नवजात शिशु एक माह पूरा होने से पहले ही मर जाते है. इन मासूम बच्चों को समय पर उचित स्वास्थ्य सेवा और समुचित देखभाल करके बचाया जा सकता है. इस अवधि के बच्चों को समुचित, संतुलित और पौष्टिक आहार न मिलने से उनमें बीमारियों से लड़ने की क्षमता भी खत्म हो जाती है. दो बाल मजदूरों ने यह रिपोर्ट राजयपाल को सौंपी. उत्तर प्रदेश की कैश टांसफर स्कीम के तहत अब ये बाल मजदूर आज स्कूल में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं.

 
उन्होंने कहा कि आज ज़रूरत है बच्चों के पौष्टिक आहार, स्तनपान, गर्भस्त शिशु की देखभाल और टीकाकरण के बारे में जगह-जगह कार्यक्रम चलाने की. आज के प्रयासों से कल उत्पन्न होने वाली समस्याओं को रोका जा सकता है. बच्चों को संतुलित भोजन, उचित देखभाल, स्तनपान को बढ़ावा, छह माह से दो वर्ष के बच्चों को पौष्टिक आहार और गर्भधारण की सही जानकारी देकर शिशु मृत्यु दर को नियंत्रित किया जा सकता है। शिशु मृत्युदर को पोलियो और चेचक सहित अन्य सभी तरह के टीकाकरण करके भी कम किया जा सकता है. उन्होंने कहा कि करोड़ों-अरबों बच्चे इंतजार में है कि कब उनको उनका मौलिक अधिकार मिलेगा. कब उनके जीवन को स्वास्थ्य की उचित सुविधा देकर बचाया जा सकेगा. हम सभी को उनको जीने और आगे बढ़ने का अधिकार देना चाहिए ताकि वे कल विश्व के नेता बन सके.

 
इस अवसर पर यूनिसेफ की उत्तर प्रदेश की प्रतिनिधि एडेल खुर्द ने विशेष 'वर्ल्ड चिल्ड्रिन् रिपोर्ट' प्रस्तुत करते हुए प्रसन्नता व्यक्त की और कहा पिछले 20 सालों के दौरान निम्न उल्लेखनीय प्रगति रही है. मसलन
  • बाल मृत्युदर में कमी आई है. जहां 1990 में पांच साल तक के 12.5 मिलियन बच्चे मौत के मुहं में समा जाते थे वही 2008 में मरने वाले बच्चों की संख्या घटकर 8.8 मिलियन रह गई. इस तरह बाल मृत्युदर में 28 प्रतिशत की कमी आई है.
  • विश्व में जल स्रोतों में 1990 और 2006 के दौरान 1.6 बिलियन की बढ़ोतरी हुई है.
  • विश्व के प्राइमरी स्कूलों में आज 80 प्रतिशत बच्चे शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं और इस स्तर पर लिंग भेदभाव में बहुत कमी आई है.
  • कुछ देशों में बाल विवाह में कमी आई है. लड़के और लड़कियों का कम उम्र में विवाह करने में भी काफी कमी सामने आ रही है.
  • बच्चों को घरेलू नौकर और वेश्यावृति से बचाने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए जा रहे हैं.
  • बच्चों को एड्स/एचआईवी से बचाने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं.

 
उन्होंने कहा कि अगले बीस सालों के दौरान चुनौतियां भी कम नहीं हैं, लेकिन उनको दूर करने का प्रयास किया जायेगा। उन्होंने कहा कि भविष्य की कई मुख्य चुनौतियां हैं, जिनमें बच्चों और महिलाओं को स्वास्थ्य और पोषण का अधिकार दिलाना, कानून में मिली सुरक्षा के अधिकार को जमीनी हकीकत पर लाना, लिंग भेदभाव को दूर करना, ' हो सकता है और नहीं हो सकता है' की दूरी को दूर करना और बाल अधिकारों के क्रियान्वयन के लिए समाज और सरकार को जागरूक करना आदि शामिल है. उन्होंने कहा कि अगले बीस सालों की सबसे बड़ी चुनौती है कि बच्चों के हितों और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए सभी के दिल में जगह बनाना. हम सभी लोगों की यह सामूहिक जिम्मेदारी है कि हर बच्चे को जीवन जीने, विकास, सुरक्षा और भागीदारी का अधिकार मुहैया कराया जाएं। एडेल खुर्द ने कहा कि वर्तमान समय में कुपोषण, मलेरिया, खसरा/ चेचक आदि बीमारियों पर नियंत्रण संभव है फिर भी आज बच्चे इन बीमारियों से मर रहे हैं. विश्वभर के तमाम बच्चों ने आज तक स्कूल का मुंह तक नहीं देखा है और उधर करोड़ों बच्चे उत्पीड़न, अत्याचार, गाली-गलौज और हिंसा पीड़ितों को संरक्षण नहीं मिल रहा है.

 
लड़कियों के अधिकारों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है. प्राइमरी तक शिक्षा ग्रहण न करने के क्षेत्र में उनका बहुमत है. उनको शारीरिक छेड़छाड़ से दोचार होना पड़ता है. यही नहीं उनका जबरन बाल विवाह करा दिया जाता है. कई देशों में तो उनको आवश्यक स्वास्थ्य सेवा तक उपलब्ध नहीं है.

 
यूनिसेफ के अगस्टीन वेलियथ ने मेहमानों का स्वागत करते हुए कहा कि भगवत गीता, कुरान और बाइबिल के बाद यह सबसे पवित्र किताब है. उन्होंने कहा कि आज से बीस वर्ष पूर्व 1989 में विश्व के नेताओं ने तय किया कि बच्चों को उनके अधिकार दिलाने के लिए सम्मेलन की ज़रूरत है, क्योंकि व्यस्कों की तुलना में 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को विशेष देखभाल और सुरक्षा की ज़रूरत होती है. विश्व बाल अधिकार सम्मेलन हर साल मनाया जाता है, जिसमें बच्चों को सुरक्षा दिलाने, उत्पीड़न से बचाने, उनको नाम/पहचान/राष्ट्रीयता दिलाने, षिक्षा और स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराने के लिए काम किया जाता है.

1 Responses to विश्व बाल अधिकार सम्मेलन : नवजात को चाहिए जीने का अधिकार

  1. aarya Says:
  2. सादर वन्दे!
    भारत में भी बच्चो की बेहतरी सोचने वाली संस्था है, लेकिन कमबख्त ए. सी. से बाहर वे निकलते ही नहीं,
    इनको अगर ४ दिन उन फुटपाथ के बच्चो के साथ छोड़ दिया जाये तो पाचवे दिन ए मर जायेंगे, लेकिन वे बच्चे उसी हाल में जीते हैं, इतना मजबूत है हमारे देश का भविष्य, और उतने ही कमजोर व निकृष्ट हैं हमारे जन नायक.
    रत्नेश त्रिपाठी

     

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अंदाज़-ए-बयां

सीने में जलन आंखों में तूफ़ान सा क्यूं है
इस शहर में हर शख़्स परेशान सा क्यूं है

दिल है तो धड़कने का बहाना कोई ढूंडे
पत्थर की तरह बे-हिस-व-बेजान-सा क्यूं है

तन्हाई की यह कौन-सी मंज़िल है रफ़ीक़ो
ता हददे-नज़र एक बयाबान-सा क्यूं है

हम ने तो कोई बात निकाली नही ग़म की
वह ज़ूद-ए-पशीमान, पशीमान-सा क्यूं है
-शहरयार

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वहां के मंत्री के घर देखा .........आलीशान
बोले ............इतनी कम पे में ऐसी कोठी कैसे
.........उसने खिड़की खोली बोला ...सामने पुल देख रहे हो ......50% कमीशन
.........अगले साल वो मंत्री लालू जी से मिलने भारत आया
लालू जी ने अपना महल दिखाया .............
वो बोला इतने गरीब बिहार में आइस्सा शानदार महल .......कैसे
लालू जी उसको छत पर ले गए .............वो नेशनल हाई वे देख रहे हो ...
मंत्री बोला कहां है? दिखाई नहीं दिया
लालू जी--------------100 % .........................."
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आज का दिन : 5 जिलहिज्ज सन हिजरी 1430, 23 नवम्बर 2009, सोमवार. तिथि संवत : मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष षष्ठी सोमवार 11.17 तक. विक्रम संवत 2066, शके 1931, सूर्य दक्षिणायन, हेमंत ऋतु. सूर्योदय कालीन नक्षत्र : श्रवण नक्षत्र 19.53 बजे तक, वृद्धि योग, 12.17 तक तैतीलकरण, 11.17 के बाद. ग्रह विचार : सूर्य-बुध-वृश्चिक , चंद्र-गुरु-मकर, मंगल-कर्क, शुक्र-तुला, शनि-कन्या, राहु-धनु, केतु-मिथुन. राहुकाल : सुबह 7.30 बजे से 9 बजे तक.