
वेदप्रताप वैदिक
अंतरिक्ष को लेकर आजकल सारी दुनिया में गहन विचार-विमर्श चल रहा है। वॉशिंगटन, डीसी में अमेरिका के अत्यंत प्रसिद्ध ‘थिंक टैंक’, सेंटर फॉर स्ट्रेटजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज ने यहां विश्व सम्मेलन का आयोजन किया है, जिसमें चीन समेत अनेक राष्ट्रों के अंतरिक्ष विज्ञान के धुरंधर भाग ले रहे हैं। जब मुझे इस सम्मेलन के उद्घाटन सत्र के मुख्य भाषण के लिए आमंत्रित किया गया तो मुझे आश्चर्य हुआ।
मैंने सोचा कि अंतरिक्ष में ऐसा क्या है कि उस पर विचार-विमर्श करने के लिए करोड़ों रुपए खर्च किए जा रहे हैं। अपने मुख्य भाषण की तैयारी करते समय और अब यहां आकर मुझे लगा कि यदि धरती मां है तो अंतरिक्ष पिता है। अंतरिक्ष को हम हजारों बरसों से जानते हैं। हमारे प्राचीन गंर्थों में उसका विशद वर्णन भी मिलता है लेकिन सचमुच अंतरिक्ष क्या है, इसका पता दुनिया को तब चला, जब 1957 में ‘स्पूतनिक’ नामक रूसी यान अंतरिक्ष में गया।
62 साल के विश्व प्रयत्न के बावजूद अभी तक अंतरिक्ष एक रहस्य ही है। फिर भी उसके बारे में जो कुछ भी पता चल पाया है और उसका जितना भी छोटा-मोटा इस्तेमाल हो पाया है, उसने हमारी दुनिया ही बदल दी है। क्या आपने कभी सोचा कि दुनिया में चल रहे तीन अरब मोबाइल फोनों पर बातचीत का तार कैसे जुड़ता है? हजारों मील दूर चल रहे टीवी कार्यक्रमों को हम अपने घरों में बैठकर कैसे देख पाते हैं?
इंटरनेट पर करोड़ों संदेश पलक झपकते ही हजारों मील कैसे पहुंच जाते हैं? भूकंपों, तूफानों, बाढ़ों और प्राकृतिक विपदाओं की अग्रिम सूचना वैज्ञानिकों को कैसे मिल जाती है? सारी दुनिया में चलने वाले मिसाइलों, उपग्रहों और जहाजों को कौन रास्ता बता रहा है? जाहिर है कि वह अंतरिक्ष ही है। आजकल हर कार में ‘जीपीएस’ लगा होता है यानी वह यंत्र जो दुनिया की हर सड़क, हर गली, हर मोहल्ले और हर घर का नक्शा आपको बताता रहता है।
आपको जहां भी जाना है, उस जगह का नाम-पता इस छोटे से यंत्र में भर दीजिए। फिर आपको किसी से पूछने की जरूरत नहीं है। आप सैकड़ों किलोमीटर अपने आप चलते चले जाएंगे। अंतरिक्ष में घूम रहे लगभग 800 उपग्रहों ने धरती के कण-कण के चित्र खींच रखे हैं। उनके पास समुद्रों, जंगलों, पहाड़ों और रेगिस्तान की बारीक से बारीक जानकारी होती है।
किसी की खोपड़ी पर कितने बाल सफेद हैं और कितने काले, यह भी उपग्रह गिनकर बता सकते हैं। इन उपग्रहों के माध्यम से दुनिया के करोड़ों लोगों को टीवी पर तरह-तरह का मुफ्त प्रशिक्षण दिया जा रहा है। आम आदमी खेती कैसे करे, कोई काम-धंधा कैसे सीखे, स्वास्थ्य रक्षा के लिए क्या-क्या उपाय करे, प्राकृतिक संकट के वक्त अपनी रक्षा कैसे करें आदि असंख्य बातें दुनिया के लगभग सभी लोगों को सहज रूप में बताई जा रही हैं।
लोग ऊर्जा के लिए सिर्फ पेट्रोल और गैस पर निर्भर न रहें और सौर ऊर्जा का मुफ्त लाभ उठाएं, यह शीघ्र संभव होने वाला है। दुनिया के हर घर में बिजली और ऊर्जा पहुंच जाएगी और वह भी एकदम सस्ती। कुछ वर्र्षो में आपको फोन करने के लिए पैसे नहीं देने होंगे। दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने तक की यात्रा सिर्फ दो घंटे में पूरी हो जाएगी। सौर ऊर्जा से सारे समुद्रों के खारे पानी को पीने लायक बनाया जा सकेगा।
प्रदूषणमुक्त विश्व की कल्पना सच्चई में बदल जाएगी। यदि चंद्रमा, शनि, शुक्र आदि ग्रहों पर हेलियम-3 जैसी गैसें और धातुएं मिल गईं तो इस दुनिया से गरीबी और गंदगी हमेशा के लिए दूर हो जाएगी। अंतरिक्ष धरती को स्वर्ग बना सकता है। लेकिन विश्व सम्मेलन में हम सबकी चिंता यही थी कि यह अंतरिक्ष कहीं इस धरती को नरक न बना दे। इस समय अंतरिक्ष कार्यो में दुनिया के कुछ प्रमुख राष्ट्रों ने लगभग 251 बिलियन डॉलर खर्च कर दिए हैं।
रुपयों में यह राशि 12 लाख करोड़ के आसपास बैठती है। यह राशि कई बड़े राष्ट्रों के कुल बजट से भी बड़ी है। कुछ राष्ट्र इतना पैसा अंतरिक्ष में क्यों लगा रहे हैं? इसका पहला कारण तो यह है कि यहां मुनाफा जोरदार है। कहते हैं कि अंतरिक्ष में एक डॉलर डालो तो सात वापस आते हैं और रुपए तो एक के 20 हो जाते हैं। इस अर्थ-लाभ से भी बड़ा कारण कुछ दूसरा ही है। वह है, फौजी तैयारी का।
अंतरिक्ष कार्यक्रम की शुरुआत पहले सोवियत रूस और उसके साथ-साथ अमेरिका ने जब की थी तो उसका कारण यही था कि दोनों एक-दूसरे से डरे हुए थे। दोनों का लक्ष्य था कि जरूरत पड़े तो वे एक-दूसरे का समूल नाश कर सकें। आज भी अमेरिका और चीन की सरकारें अपने इस इरादे को छिपाकर नहीं रखतीं। वास्तव में अंतरिक्ष के सशस्त्रीकरण पर महाशक्तियों ने ज्यादा जोर इसीलिए दिया कि धरती के मुकाबले अंतरिक्ष हजार गुना अधिक प्रभावी है।
उसकी अच्छाई भी हजार गुना है और बुराई भी हजार गुना। यदि एक उपग्रह आप धरती पर तोड़ दें तो वह कितना नुकसान करेगा? और उसी उपग्रह को आप आकाश में नहीं, अंतरिक्ष में तोड़ दें तो क्या होगा? सारे संसार में उसके टुकड़े बिखर जाएंगे और पता नहीं, वे क्या-क्या नुकसान करेंगे। कल्पना कीजिए कि चेर्नोबिल या थ्रीलांग माइल जैसी परमाणु-रिसन की दुर्घटना अंतरिक्ष में हो जाती तो क्या हो जाता?
क्या करोड़ों लोग पलक झपकते ही मर नहीं जाते? इसीलिए मैंने इस सम्मेलन में धरती को मां और अंतरिक्ष को पिता कहा है। माता पृथिव्या: पितरो अंतरिक्ष:। हम लोगों ने मां से बहुत छूट ली है, लेकिन वैसी छूट हम पिता से नहीं ले सकते। दो दिन के सभी सत्रों में सारे विशेषज्ञों और सरकारी अधिकारियों ने इसी सूत्र पर विचार-विमर्श किया कि अंतरिक्ष को शस्त्रीकरण से कैसे बचाया जाए और अंतरराष्ट्रीय सहयोग कैसे बढ़ाया जाए।
इन लक्ष्यों की पूर्ति के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ की देख-रेख में बाहरी अंतरिक्ष संधि (1967), चंद्रमा संधि(1979) तथा अन्य कुछ समझौते हो चुके हैं लेकिन अभी तक अंतरिक्ष-कानून जैसी कोई पक्की चीज नहीं बन पाई है। अंतरिक्ष के नियमों का उल्लंघन करने वाले राष्ट्रों या संगठनों के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई की कोई व्यवस्था नहीं है। सभी महाशक्तियों के गुप्त इरादे इतने आक्रामक हैं कि पिछले 30 साल में उनके बीच कोई भी अंतरिक्ष समझौता नहीं हुआ है।
मैंने अपने मुख्य भाषण में मांग की है कि 1967 की संधि फिर से लिखी जाए और उसके चोर दरवाजे बंद किए जाएं, राष्ट्रीय संप्रभुताओं के बजाय वैश्विकता को प्रोत्साहित किया जाए, अंतरराष्ट्रीय कानून की जगह विश्व-कानून की धारणा विकसित हो, अंतरिक्ष विश्व-कोष का निर्माण हो और वैश्विक अंतरिक्ष प्राधिकरण (ग्लोबल स्पेस अथॉरिटी) की स्थापना की जाए। सम्मेलन का समापन यजुर्वेद के शांति पाठ से हुआ, जिसमें अंतरिक्ष की शांति की प्रार्थना है। सभी प्रतिनिधियों ने तीन बार- ‘शांति, शांति, शांति’ का उच्चरण किया।
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